हम सब उम्मीद करते हैं कि जब सड़क पर किसी के साथ कुछ गलत होगा तो पूरी भीड़ मिलकर उसे बचाएगी, लेकिन असलियत देखनी हो तो अगर किसी लड़की या अन्य किसी के छेड़ाखानी हो रही हो या उनके साथ बदतमीजी जैसी घटना हो रही है तब वहाँ मौजूद लोग उनकी मदद करने के बजाय अपने फोन के कैमरे ऑन कर लेते हैं ताकि उस खौफनाक मंजर का लाइव वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करके व्यूज और लाइक्स बटोरे जा सकें। यही आज की कड़वी हकीकत है। हमारी इंसानियत अब सीधे डिजिटल हो चुकी है, जहाँ किसी भूखे को रोटी देने से ज्यादा जरूरी उसकी फोटो खींचकर फेसबुक पर डालना है और किसी की इज्जत लूटती देख पुलिस को फोन करने के बजाय व्हाट्सएप ग्रुप में वीडियो फॉरवर्ड करना ज्यादा जरूरी लगता है। बाद में जब पुलिस आती है, तो उनको भी इस बात का दुख होता है पुलिस अपना काम करती है लेकिन तब तक वीडियो धड़ल्ले से शेयर हो चुका होता है। जब वीडियो वायरल हो जाता है, तब जाकर समाज सोकर उठता है और मोमबत्तियाँ ढूंढने लगता है। हम दूसरों से तो उम्मीद करते हैं कि वो राजा हरिश्चंद्र या भगत सिंह बन जाएं, पर खुद वक्त आने पर हमें क्या लेना-देना कहकर मुंह मोड़ लेते हैं या फिर चुपचाप तमाशा देखते हैं। असल में इंसानियत कहीं मरी नहीं है, वो बस हमारे स्मार्टफोन की स्क्रीन के पीछे छुपकर तमाशा देख रही है और जब तक कैमरा ऑन है, तब तक हम सिर्फ रील बनाने वाले तमाशबीन हैं, जिन्हें इंसानियत का पता नहीं।

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