कभी सामान तो कभी किसी खाना पहुँचाने वाले डिलिवरी वर्कर्स आज दिखने आम हैं।
ये विभिन्न काम करने वाले गिग वर्कर-खाना-सामान पहुँचाने वाले, घर के काम जैसे सफाई, बर्तन, इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बर आदि का काम करने वाले सब; एप्स से काम पाते हैं।
लेकिन इन कंपनियों के अल्गोरिथम का खेल ऐसा होता है कि जो भी इनके साथ काम करने को रजिस्टर करता है वह एक मरीचिका में फँस जाते हैं। हर काम के बाद उनके समय पर पहुँचने की, व्यवहार की, गाडी और सुरक्षा आदि कई मानदंडों पर रेटिंग होती है। ग्राहक के द्वारा रेटिंग गड़बड़ा जाने पर आगे काम मिलने की संभावना कम होती जाती है। ऐसे में वे एक जगह से दूसरी जगह केवल गाड़ी दौड़ाते रहते हैं, इस दबाव में कि समय से पहुँच जाएं। ऐसे में 25% से 50% तक डिलिवरी वर्कर सड़क हादसों का शिकार हो जाते हैं।
कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती इसके बाद भी ये लोग समाज की तरफ से निरादर भी पाते हैं। इन्हें रोज़गार देने वाली कम्पनियाँ और सरकार भी जैसे इनकी तरफ से उदासीन है। कंपनियों में इन डिलीवरी वर्करों के लिए कोई रोज़गार सुरक्षा नहीं है। कभी भी छटनी के नाम पर इन्हें बाहर किया जा सकता है। और रेटिंग के आधार पर तो इन्हें हटाने का पूरा इंतज़ाम है ही। यह भी केवल कंपनियों द्वारा स्थापित अल्गोरिथम के कारण।
प्रशासन और सरकार भी जैसे इनके लिए नहीं हैं। ये जिन कठिन परिस्तिथियों में काम करते हैं और उसके बाद केवल किसी ग्राहक के द्वारा दी गई खराब रेटिंग के आधार पर इनका रोज़गार छीना जा सकता है।
विषम मौसम में, सड़कों के जाम से जूझते, रोज़गार के लिए नियमों को दाँव पर लगाते ये डिलीवरी बॉय वास्तव में केवल सुरक्षा चाहते हैं। जो पुलिस अधिकतर बड़ी-बड़ी घटनाएँ नज़रअंदाज़ कर देती है वह इन निरीह लोगों से उलझ सकती है।
ऐसा नहीं की सरकार इन लोगों की तरफ से पूरी तरफ से उदासीन हो लेकिन कम्पनियाँ जैसे सरकार को भी चकमा दे देती हैं और बड़ी आसानी से इन कर्मचारियों को निकाल सकती हैं। इसमें पहुँचने के समय के आधार पर दी जाने वाली रेटिंग का सबसे अहम योगदान है। अभी 80 लाख लोग इस क्षेत्र में हैं जिनका 2030 तक बढ़कर 7 करोड़ हो जाने का अनुमान है। ऐसे में इनके लिए ठोस रणनीति की आवश्यकता है।


