
आज के इस समय में नरेंद्र मोदी के ठोस नेतृत्व में सत्तापक्ष और राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल, अखिलेश यादव आदि के मिले-जुले नेतृत्व में मोदी पक्ष की नीतियों का विरोध प्रगतिशील एवं रचनात्मक अंकुश न बनकर विध्वंसक अंध विरोध में बदलता जा रहा है।
इनमें सबसे नया प्रकरण है चुनाव आयोग के नेतृत्व में हुई विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) पर विपक्ष के द्वारा बेबुनियाद सवाल-जवाब और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सत्तापक्ष के अनुचित सहयोग करने के मनगढंत आरोप। इस सब में यह साधारण और सामान्य प्रक्रिया अनुचित विवादों में उलझती जा रही है। इस सब के पीछे एक अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छापा एक लेख है जिसमें दावा किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सहायक आयुक्तों डॉ. सुखवीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी के नहीं चल रहा है और ज्ञानेश कुमार बाकी दोनों की राय नहीं ले रहे हैं। जबकि सच यह है कि तीनों आयुक्तों ने अपनी तरफ से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आकर सब अटकलों को विराम देने का काम किया है।
लेकिन विपक्ष इसे एक मुद्दा बनाने की फिराक में है ताकि संविधान की लाल किताब दिखाकर, संविधान खतरे में होने का डर दिखा सके और पहले 2027 में उत्तर प्रदेश और उसके बाद 2029 में केंद्र की सत्ता हथिया सके।
नीट में नक़ल का हौवा खड़ा करने के बाद विपक्ष की तब हवा निकल गयी जब उसी आंदोलन को हाईजैक करने वाली कांग्रेस के अपने राज्य झारखंड में नौकरियों की खरीद-फरोख्त की बात सामने आई। हज़ारों छात्र भूख हड़ताल पर बैठे लेकिन छात्र हित का दम भरने वाली कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, आदि कोई भी सामने नहीं आया। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पहले तो छात्रों के आंदोलन को कुचलने की हर कोशिश की (जिसे किसी ने भी दमन तो क्या गलत भी नहीं बताया), होने पर परीक्षाएं स्थगित कर दीं। इसके खिलाफ जब पहले से नियुक्त छात्र न्यायालय गए तो उन्होंने छात्रों के समर्थन और परीक्षा रद्द करने पर सफाई देने को वकील तक नहीं मुहैया कराया।
इसके बाद पिछड़ों-दलितों का मुद्दा उठाकर सवर्ण हिन्दुओं एवं दलितों के बीच खाई बनाने का काम किया गया गया। जहाँ दलितों को मनुस्मृति के नाम पर लामबंद करने की कोशिश हुई जिसका किसी हिन्दू घर में शायद ही कोई अस्तित्व हो, वहीं सवर्णों को आरक्षण के खिलाफ इकठ्ठा करने की कोशिश हुई जो कि मोदी सरकार ने कभी लागू किया ही नहीं था। यह व्यवस्था तो स्वतन्त्रता के बाद से लागू है जिसके आधार पर, जिसका दायरे बढ़ने का वायदा करके पिछले समय से सभी सत्ता की मलाई चाटने में लगे हुए हैं।
याद रहे इस बीच कांग्रेस ने इसी SIR के बाद केरल चुनाव जीता और तमिलनाडु में जहाँ कांग्रेस का जनाधार था ही नहीं, वहाँ विजय जोसेफ की एकदम नई पार्टी टी.वी.के. ने विजय पाई। इतना ही नहीं कांग्रेस ने त्रिशंकु विसधानसभा की स्थिति आने पर अपने पुराने सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र खडगम को छोड़कर विजय का दामन थाम लिया। क्या इसे वोटों की चोरी माना जा सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार एक चुनी हुई सरकार का इस तरह विरोध, हर बात पर पहले किसी मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी का इस्तीफा माँगने का उपक्रम और उसके बहाने एक सड़क पर आंदोलन खड़ा करने की कोशिश शायद नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका पाकिस्तान जैसा संकट खड़ा करने की कोशिश है।
इसी बीच एक खबर आती है कि IIT मुंबई जैसे उच्च गुणवत्ता वाले संस्थान में एक अध्यापक सूर्यनारायण दूला ने द्वितीय वर्ष एक छात्र साहिल वकोड़े को परीक्षा में चैट जी.पी.टी. से नक़ल करते पकड़ा। जिसके बाद उसे परीक्षा से निकाल दिया गया। हॉस्टल के जाकर उस छात्र ने आत्महत्या कर ली। तब तो जैसे पूरा ईकोसिस्टम प्रोफेसर सूर्यनारायण और निदेशक केदारे के पीछे पड़ गया और प्रोफेसर डूले को हटा दिया गया। हालांकि शिक्षक और अन्य छात्र प्रोफेसर सूर्यनारायण दूले के समर्थन में खड़े हैं लेकिन इसने भी विपक्ष को दलित बनाम सवर्ण मुद्दा तो दे दिया।
अब अक्टूबर 2026 से विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन करने को तैयार बैठा है। देखना होगा ऊँट किस करवट बैठता है।

