देश हो या विदेश, अपनी नागरिकता का पुख्ता प्रमाण रखना हर एक नागरिकता का कर्त्तव्य और अधिकार दोनों है। भारत में भाँति-भाँति की सेवाएं और योजनाएँ मौजूद हैं। सबके अपने-अपने पहचान पत्र हैं। सभी आपस में जुड़े हैं खासतौर से आधार से किन्तु क्या होगा अगर कोई कहे की आधार स्वयं ही नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। लगभग हर नागरिक के पास आधार कार्ड है। चुनाव आयोग ने सभी व्यस्क मतदाताओ के लिए मतदाता पहचान प्रमाण पत्र जारी किया है लेकिन वह भी केवल इस बात का प्रमाण है कि उस व्यक्ति विशेष का नाम चुनाव सूची में है और वह वोट देने के लिए स्वतंत्र है। पासपोर्ट भी हम में से कई लोग रखते हैं लेकिन क्या यह हमको अधिकार दिला सकता है? तो उत्तर है नहीं। बीते 24 जून को पासपोर्ट सेवा दिवस विदेश मंत्रालय ने कुछ ऐसा कहा कि सभी संभ्रांत नागरिकों के पैरों की ज़मीन खिसक गयी। यह कानूनी तौर पर सही हो सकता है, शायद नया भी

न हो किंतु अप्रत्याशित ज़रूर है। टिप्पणी यह थी की भारतीय पासपोर्ट मूलतः एक यात्रा दस्तावेज है। यह पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत जारी किया जाता है और मुख्या रूप से विदेश में यात्रा करते समय राष्ट्रीयता प्रमाणित करता है, लेकिन नागरिकता अधिनियम 1955 के अंतर्गत यह नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि असाधारण जनहित मामलों में गैर नागरिकों को भी पासपोर्ट दिया जा सकता है। यह बयान एक बहु बड़ा झटका है पहले से आशंकित लोगों के लिए। अगर पासपोर्ट जैसा संभ्रांत दस्तावेज भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो फिर क्या बचा है नागरिकता प्रमाणित करने के लिए? यह नहीं बल्कि बंबई हाईकोर्ट के सन 2013 के एक फैसले समेत पुरानी सच्चाई है। यह स्पष्टीकरण विशेष गहन पुनःपरीक्षण (एस.आई.आर.) के बीच आया है। इससे अनेक लोगों के बीच आशंका बढ़ी है की कहीं यह नागरिकता की कवायद के बीच सरकार के नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एन.आर.सी.) या नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए) जैसे किसी नए फैसले की पटकथा तो नहीं। इस बीच एक सवाल उठ खड़ा हुआ है कि देश में एक भी सर्वमान्य नागरिकता पहचानपत्र नहीं है। दर्जनों पह्वचानपरता हमारे पास हैं लेकिन एक भी ऐसा नहीं है जिसे हम कह सकें की यह है हमारी नागरिकता का प्रमाण। आधार पहचान और निवास का प्रमाण है, पैन कार्ड शुद्ध रूप से टैक्स सम्बन्धी मकसद के लिए है, आभा कार्ड चिकित्सा सेवाओं के लिए किसी की भी मेडिकल हिस्ट्री का प्रमाण है, वोटर प्रमाणपत्र केवल इस बात का प्रमाण है की फलाँ व्यक्ति वोट देने के लायक है और उसका नाम वोटर लिस्ट में है। इसकी अलावा राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि भी केवल सेवा केंद्रित दस्तावेज हैं। इसमें यह भी याद रखना होगा की साल 2025 में अवैध प्रवासियों से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए बंबई उच्च न्यालाय ने कहा था की केवल आधार, पैन, वोटर आई.डी., या पासपोर्ट (कोई भी एक या चारों एक साथ भी) नागरिकता स्थापित नहीं करते। ये सब केवल पहचान और सेवा के लिए हैं, नागरिकता अधिनियम के तहत तय शर्तों के विकल्प नहीं। अब सवाल उठता है कि कैसे सिद्ध हो नागरिकता? अधिनियम 1955 के अनुसार नागरिकता जन्म, वंशानुक्रम, पंजीकरण, प्राकृतिकीकरण (नेचुरलाइज़ेशन) या किसी क्षेत्र के देश में शामिल किये जाने की दशा में (क्षेत्रीय समावेशन) से मिलती है। किंतु करोड़ों भारतीयों को अपनी जन्म से मिली नागरिकता सिद्ध करने का कोई प्रमाण नहीं पता। इसकी बजाय एक पूरा बंडल जिसमें जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता की नागरिकता या अधिवास के रिकॉर्ड, स्कूल के पुराने रिकॉर्ड और कागजात, अधिवास (डॉमिसाइल); आदि शामिल हैं। आम आदमी इसलिए परेशान है क्योंकि साधारण स्थिति में तो ये काग़ज काम कर सकते हैं लेकिन कानूनी विवाद खड़ा होने के समय कानून ही इन्हें नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाता। एसे में वोटर पहचान के लिए, नागरिकता प्रमाण के लिए, संपत्ति विवाद या वंशानुगत विवाद के समय, या आव्रजन विवाद के समय नागरिकता साबित करना कितना मुश्किल होगा सोचने भर से ही डर लगने लगता है। हालांकि कोई भी देश अपने नागरिकों को एक कार्ड या पहचानपत्र नहीं दे सका है जो पहचान की हर जरूरत का एक ही हल हो। मलेशिया का माईकार्ड भी पासपोर्ट का विकल्प नहीं बन सका है। सारे डाटा को एक कार्ड में समेट देने से सुरक्षा जोखिम भी बढ़ जायेंगे। भारत की चुनौती बड़ी है। 1.5 अरब जनसंख्या, भाषाई विविधता, शहरी-ग्रामीण डिजिटल खाई; ये हमारे यहाँ की हकीकत है। आधार को भी हम 17 साल बाद वह रूप और परिपक्व वातावरण दे पाये हैं जो आज है। अमेरिका में सोशल सिक्योरिटी नंबर, चीन का रेजिडेंट आइडेंटिटी कार्ड, मलेशिया का माईकार्ड, आदि लगभग सभी जगह अपने-अपने पहचान कार्ड हैं जो अलग-अलग सेवाओं से जुड़े हैं; लेकिन कोई भी देश एक एसा कार्ड देने में असफल रहा है जो सभी सेवाओं के लिए एक हो। ‘एक देश, एक कार्ड’ बहुत ही अच्छा नारा है किन्तु अव्यावहारिक है। आज जब विश्व डिजिटल गाँव बन चुका है, एसे में एक डिजिटल कार्ड में सारा डाटा, किसी के लिए भी आसान शिकार बन सकता है। अपने देशवासियों का डाटा डार्क वेब पर जाने से बचाना भी एक बड़ी जिम्मेदारी है। एक छोटी गलती और बड़ा साइबर हमला! अब प्रश्न यह उठता है कि सरकार क्या करे? पहचानपत्रों के इस जाल को सुलझाने के साथ यह भी सुनिश्चित करना सरकार का ही दायित्व है कि कोई भी व्यक्ति अवैध आधार ना रख पाये और भारत की नागरिकता छोड़ देने के बावजूद भी केवल पासपोर्ट के कारण भारत में वोट न डाल सके।

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