तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा से बेहद डर लगता है, जो बीते करीब 67 साल से भारत में रह रहे हैं। चीन तिब्बत को अपना क्षेत्र मानता है। उसे डर है कि कहीं तिब्बत में चीन के खिलाफ सांस्कृतिक और जातीय आंदोलन न शुरू हो जाए। यही वजह है कि वह तिब्बत की सीमा से सटे भारत और नेपाल दोनों से सशंकित रहता है। तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने बुधवार को सोशल मीडिया एक्स पर एक ट्वीट किया था। उनका यह ट्वीट वैसे तो आम दिनों की तरह ही था, मगर उसके पीछे कुछ संदेश छिपा हुआ है। समझते हैं कि इस ट्वीट के पीछे छिपे संदेश का क्या मतलब है? इस संदेश में उन्होंने डर, भरोसा, सहयोग और दोस्ती की बात की है।
दलाई लामा ने किया यह ट्वीट
दलाई लामा ने सोशल मीडिया एक्स पर ट्वीट में लिखा-सिर्फ स्नेह और गर्मजोशी ही खुशी ला सकते हैं। इनसे सचमुच अंदरूनी ताकत और आत्मविश्वास मिलता है, डर कम होता है, भरोसा बढ़ता है और भरोसे से दोस्ती होती है। हम सामाजिक प्राणी हैं और हमारे जीवित रहने के लिए सहयोग जरूरी है, लेकिन सहयोग पूरी तरह भरोसे पर टिका होता है। जब भरोसा होता है, तो लोग एक-दूसरे के करीब आते है। पूरे देश एक-दूसरे के करीब आते हैं। जब आपका मन दयालु होता है और आप गर्मजोशी अपनाते हैं, तो आपके आस-पास का पूरा माहौल ज्यादा सकारात्मक और दोस्ताना हो जाता है।
दलाई लामा का यह ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके मायने निकाले जाने लगे। स्टोरी में आगे जानने की कोशिश करते हैं। बीते साल चीन के राष्ट्रपति ने किया था तिब्बत का दौरा
बीते साल 20 अगस्त को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा का एक दुर्लभ और अचानक दौरा किया। यह दौरा तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर किया गया। यह क्षेत्र वैश्विक मामलों में काफी विवादित और चर्चा का विषय रहा है।
शी का तिब्बत दौरा, तिब्बती आध्यात्मिक नेता 14वें दलाई लामा द्वारा अपने उत्तराधिकारी के पुनर्जन्म के बारे में हाल ही में की गई घोषणा के बाद हुआ है। भारत के धर्मशाला में आयोजित 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में, जहां तिब्बत की निर्वासित सरकार स्थित है।
अपने 90वें जन्मदिन पर उन्होंने पुष्टि की कि 'दलाई लामा की संस्था बनी रहेगी'। गादेन फोड्रंग ट्रस्ट 14वें दलाई लामा से जुड़ी एक संस्था है। उस वक्त 14वें दलाई लामा ने कहा था-'भविष्य के पुनर्जन्म को मान्यता देने का एकमात्र अधिकार गादेन फोड्रंग ट्रस्ट के पास है। किसी और के पास इस मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।'
जिनपिंग को सताता है चीन विरोधी आंदोलन का डर
दरअसल, तिब्बत में धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्रों में चीन के विवादित सुधारों के बावजूद, तिब्बत में चीन-विरोधी आंदोलन के फिर से शुरू होने का डर बना हुआ है।
दरअसल, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का तिब्बत पर 70 साल से नियंत्रण होने के बावजूद यह इलाका चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
दूसरा यह है कि 14वें दलाई लामा तिब्बती समुदाय के लिए सबसे प्रभावशाली नेता बने हुए हैं। तिब्बत में धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्रों में चीन के विवादित सुधारों के बावजूद तिब्बत में चीन-विरोधी आंदोलन के फिर से शुरू होने का डर बना हुआ है।
भारत के अलावा नेपाल भी है चीन की चिंता
वहीं, दूसरी ओर चीन के लिए नेपाल भी एक चिंता की वजह बना हुआ है। दरअसल नेपाल की सीमा तिब्बत से लगती है और वहां लगभग 12,000 निर्वासित तिब्बती रहते हैं।
14वें दलाई लामा ने अपने पुनर्जन्म और उत्तराधिकारी से जुड़े सवालों पर स्थिति साफ कर दी थी। उन्होंने कहा था कि धर्मशाला में मौजूद 'सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन' (निर्वासित सरकार) ही तिब्बत की असली राजनीतिक सत्ता है और 14वें दलाई लामा के पद को ही अपने उत्तराधिकारी की पहचान करने और उसे नियुक्त करने का अधिकार है। यह चीन के उस दावे के ठीक उलट है जिसमें बीजिंग इसे अपना एकमात्र अधिकार मानता है।
भारत का क्या रहा है रुख
1959 से ही भारत ने तिब्बती समुदाय और उनके सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को शरण दे रखी है। भारत सरकार आस्था और धर्म से जुड़ी मान्यताओं और रीति-रिवाजों के मामलों पर कोई पक्ष नहीं लेती और न ही उन पर कोई टिप्पणी करती है और सरकार ने हमेशा भारत में सभी के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया है और आगे भी करती रहेगी।
भारत का पुराना रुख बरकरार
14वें दलाई लामा के भारत आने के एक दशक बाद 1969 में उन्होंने एक बयान में कहा था-'जब मैं लगभग नब्बे साल का हो जाऊंगा, तो मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के वरिष्ठ लामाओं, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म को मानने वाले अन्य संबंधित लोगों से सलाह-मशविरा करूंगा कि क्या दलाई लामा की संस्था को जारी रखा जाना चाहिए या नहीं।'
क्या बातें सामने आती रही हैं
हालांकि, तब से समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया, तिब्बती लोगों और तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों की ओर से 14वें दलाई लामा के कार्यालय से ऐसे ही सवाल पूछे जाते रहे हैं कि इस आध्यात्मिक नेता का उत्तराधिकारी कौन होगा और क्या अगला दलाई लामा होगा या नहीं।
साथ ही, कुछ लोगों का यह भी कहना था कि हो सकता है दलाई लामा का कोई उत्तराधिकारी न हो और यह संस्था 14वें दलाई लामा के साथ ही समाप्त हो जाए, जबकि अन्य लोगों का मानना था कि शायद कोई महिला अगली दलाई लामा बने।
वहीं, बीजिंग अक्सर ये दावा करता रहा है कि दलाई लामा का पुनर्जन्म और उत्तराधिकार मूल रूप से चीन का आंतरिक मामला है।

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