4 अगस्त 2009 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यू.पी.ए सरकार ने शिक्षा का अधिकार क़ानून पास किया। भारतीय संविधान के आर्टिकल 21(अ) यह क़ानून 6 से 14 साल के सभी वंचित बच्चों को अच्छे प्राईवेट स्कूलों में उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने स्कूलों को निर्देशित किया कि वे 25ः सीटें उन छात्रों के लिए आरक्षित रखें। इसके अंतर्गत शिक्षा पाने के लिए सभी वंचित वर्ग के आर.टी.ई. पोर्टल पर फॉर्म भरकर प्रक्रिया में हिस्सा ले सकते हैं। फिर उस जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी के द्वारा फॉर्म और दस्तावेजों की जाँच करने के बाद लाटरी सिस्टम से छात्रों को उनके वार्डों में विद्यालय आवंटित किया जाता है। उत्तराखंड में भी यही परिपाटी है।

किन्तु एक आर0टी0आई0 से मिली जानकारी के अनुसार जिस प्रकार लॉटरी का सिस्टम है उससे यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की लॉटरी तो एक नाम का बहाना हो गई है। जिस प्रकार से ऑन लाइन फार्म भरने का तरीका है उससे पता चलता है कि लॉटरी के स्थान पर पर फर्स्ट काम फर्स्ट सर्व बन गया है।

                                                                                                आपको बताते हैं इसकी विसंगतियां
शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत छात्र ऑनलाइन फॉर्म में ही अपने निकट के विद्यालयों का नाम पोर्टल में दर्ज कर सकते हैं लेकिन कई बार विद्यार्थी फॉर्म भरने के दौरान पोर्टल जाम है या सर्वर डाउन होने के कारण कितने ही विद्यार्थियों का फॉर्म पूरा भरा ही नहीं जाता। जब विद्यार्थी पुनः अपना फार्म भरता है तो र्पोटल पर स्कूल नहीं दिखाई देता है, विभाग के अनुसार

अगर उस वार्ड में स्कूल नहीं दिखा रहा है तो उस स्थिति में अपने निकटतम वार्ड के स्कूल से चुनाव किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में स्पष्ट हो रहा है कि यहाँ लॉटरी का सिस्टम है ही नहीं ? क्यूँकि लॉटरी तभी मानी जा सकती है जब सभी विद्यार्थी अपना फार्म स्कूल के साथ भर सकें लेकिन, फार्म भरते समय स्कूलों का र्पोटल पर नहीं प्रदर्शित होना सीधा-सीधा संकेत है कि लॉटरी केवल गुमराह करने की बात है।
छात्र अपना फॉर्म पूरा भर ही नहीं पाते और उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने का उनका सपना अधूरा ही रह जाता है। फिर इसके बाद शुरू होता है अधिकारियों और नेताओं की मोनोपॉली और बंदरबाँट का खेल। इसके बाद आपसी सेटिंग से शहर के प्रतिष्ठित स्कूलों की सीटों को आपस में ही अपने जान-पहचानवालों को बाँट दिया जाता है। इसमें स्कूलों की संलिप्तता से भी इंकार नहीं किया जा सकता जो मुनाफे के लिए वंचित वर्ग के बच्चों की सीटों को खुर्दबुर्द कर देते हैं।
जो भी हो इस सब में कथित पारदर्शिता के अभाव में वंचित और उप वंचित वर्ग के साथ अन्याय हो रहा है। सरकार को चाहिए कि जो भी आवश्यक कदम हों वो उठाये। पोर्टल की देखरेख करने वाली कंपनी इंडस एक्शन को आवश्यक सुधार करने के लिए कठोरता से निर्देशित करे ताकि सबके लिए शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करे ताकि गाँधी जी के स्वप्न के अनुसार कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक भी उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंचाया जा सके।
लेखक वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।

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