हमने अपने समाचार पत्र में पहले भी इस बात को प्रकाशित किया था कि खेलों से देश की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन, ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल-2026 ने एक बार फिर देश की खेल व्यवस्था के सामने एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिसका उत्तर केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि नीति और नीयत से दिया जाना चाहिये। जब देश के कुल 13 स्वर्ण पदकों में से 7 गोल्ड अकेले हरियाणा के खिलाड़ी जीतकर लाएं, कुल 39 पदकों में से 11 मेडल पर हरियाणा का कब्जा हो, मुक्केबाजी में भारत के 10 में से 7 पदक हरियाणा दिलाए और फिर भी खेल बजट के मामले में इस प्रदेश की अनदेखी हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की खेल नीति प्रदर्शन के आधार पर बन रही है या किसी और आधार पर? महज लगभग दो प्रतिशत आबादी वाला हरियाणा वर्षों से देश की खेल शक्ति का सबसे बड़ा आधार रहा है। ओलंपिक हो, एशियाई खेल हों या कॉमनवेल्थ गेम्स, हर बड़े मंच पर
हरियाणा के खिलाड़ी भारत का तिरंगा सबसे अधिक बार बुलंद करते रहे हैं। इस बार भी हरियाणा ने अपनी परंपरा को कायम रखा। प्रदेश के 11 खिलाड़ियों ने पदक जीते, जिनमें 8 खिलाड़ी पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में उतरे थे। यह बताता है कि हरियाणा केवल चौंपियन नहीं बना रहा, बल्कि लगातार नई विश्वस्तरीय प्रतिभाएं तैयार कर रहा है। सबसे उल्लेखनीय प्रदर्शन मुक्केबाजी में सामने आया। भारत को मिले 10 पदकों में से 7 पदक हरियाणा के मुक्केबाजों ने जीते, जबकि 7 स्वर्ण पदकों में से 6 स्वर्ण हरियाणा की झोली में आए। एथलेटिक्स में भी हरियाणा के खिलाड़ियों ने स्वर्ण, रजत और कांस्य जीतकर साबित कर दिया कि यह प्रदेश केवल एक खेल नहीं, बल्कि लगभग हर खेल में देश की सबसे मजबूत ताकत है। यह सफलता तब मिली है जब इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में कुश्ती, हॉकी, बैडमिंटन, क्रिकेट, टेबल टेनिस और कई ऐसे खेल शामिल ही नहीं थे जिनमें हरियाणा की पारंपरिक बादशाहत रही है। यदि ये खेल भी शामिल होते तो भारत के पदक तालिका में हरियाणा की हिस्सेदारी और भी अधिक होती। हरियाणा की सबसे बड़ी ताकत उसकी मिट्टी और उसके परिवार हैं। यहां के अधिकांश खिलाड़ी छोटे किसानों, मजदूरों और सामान्य परिवारों से निकलते हैं। अनेक माताएं अपनी जरूरतें त्यागकर बच्चों को खेल मैदान तक पहुंचाती हैं। यही कारण है कि आज हरियाणा की बेटियां भी दुनिया में भारत का परचम लहरा रही हैं। इस बार हरियाणा के 11 पदक विजेताओं में 6 बेटियां शामिल रहीं। यह केवल खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की भी मिसाल है। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न देश की खेल नीति पर उठता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हरियाणा को केंद्र सरकार से खेल अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के लिए लगभग 63 करोड़ रुपये मिले, जबकि गुजरात को लगभग 661 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। इसके अतिरिक्त गुजरात को ‘ओलंपिक रेडी’ परियोजना के लिए लगभग 5,000 करोड़ रुपये की विशेष मदद भी प्रदान की गई। यदि इन निवेशों का उद्देश्य भविष्य के खिलाड़ी तैयार करना है तो यह अच्छी पहल है, लेकिन तब यह भी पूछा जाना चाहिए कि जो प्रदेश आज देश को सबसे अधिक अंतर्राष्ट्रीय पदक दिला रहा है, उसे उसकी उपलब्धियों के अनुरूप संसाधन क्यों नहीं मिल रहे? विडंबना यह है कि हाल के दिनों में हरियाणा के कई सरकारी स्टेडियमों की जर्जर हालत सामने आई। कहीं सिंथेटिक ट्रैक टूटे हुए हैं, कहीं आधुनिक उपकरणों का अभाव है, तो कहीं खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद हरियाणा के खिलाड़ियों ने विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया। यह उनकी प्रतिभा, अनुशासन और संघर्ष का परिणाम है, न कि सरकारी सुविधाओं का। खेल नीति का पहला सिद्धांत होना चाहिए कि जहां से पदक आएं, वहां निवेश भी सबसे अधिक हो। यदि हरियाणा को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण केंद्र, आधुनिक खेल विज्ञान प्रयोगशालाएं, उच्च स्तरीय कोचिंग और पर्याप्त केंद्रीय सहायता मिले तो यह प्रदेश अकेले भारत के पदकों की संख्या कई गुना बढ़ा सकता है। हालांकि खेलों में निवेश का उद्देश्य केवल भवन बनाना नहीं, बल्कि पदक जीतने वाली प्रतिभाओं को तैयार करना होना चाहिए। ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल-2026 का सबसे बड़ा संदेश स्पष्ट है-भारत को पदक चाहिए तो हरियाणा को संसाधन देने चाहिये। यदि पदक हरियाणा ला रहा है और बजट कहीं और जा रहा है, तो यह केवल हरियाणा के साथ नहीं, बल्कि भारत के खेल भविष्य के साथ भी अन्याय है। अब समय आ गया है कि केंद्र इस असंतुलन को दूर करे और उन राज्यों को प्राथमिकता दे जो वास्तव में देश के लिए विश्व मंच पर तिरंगा फहरा रहे हैं। क्योंकि खेलों में सम्मान भाषणों से नहीं, बल्कि सही निवेश और सही नीति से मिलता है।

