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युवाओं में बढ़ती नशाखोरी बनी चिन्ता का विषय, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

उत्तराखण्ड में बढ़ती नशाखोरी अब सामाजिक चिंता का बड़ा विषय बनती जा रही है। खासकर देहरादून और आसपास के शहरी क्षेत्रों में युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने अभिभावकों, शिक्षकों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। ग्राउंड स्तर पर की गई पड़ताल में सामने आया है कि स्कूल-कॉलेज के आसपास, किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों और कुछ सुनसान इलाकों में नशीले पदार्थों की उपलब्धता पहले की तुलना में आसान हो गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम होते ही कुछ स्थानों पर युवाओं के समूह इकट्ठा होते हैं, जहां धूम्रपान से लेकर अन्य नशीले पदार्थों का सेवन खुलेआम देखा जा सकता है। कई अभिभावकों ने चिंता जताई कि कम उम्र के छात्र भी गलत संगत में आकर नशे की गिरफ्त में फंस रहे हैं। इससे न केवल पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि परिवारों में तनाव और सामाजिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नशाखोरी का मुख्य कारण बेरोजगारी, मानसिक तनाव, सोशल मीडिया का प्रभाव और गलत संगति है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, युवाओं में प्रतिस्पर्धा का दबाव और भविष्य की चिंता उन्हें नकारात्मक आदतों की ओर धकेल रही है। कई मामलों में यह भी सामने आया कि शुरुआत शौक के तौर पर होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह लत में बदल जाती है। स्थानीय व्यापारियों ने बताया कि कुछ क्षेत्रों में बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने के साथ संदिग्ध गतिविधियाँ भी बढ़ी हैं। लोगों ने प्रशासन से नियमित गश्त बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में निगरानी की मांग की है। वहीं पुलिस का कहना है कि नशे के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है और संदिग्ध गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। समय-समय पर चेकिंग अभियान भी चलाए जा रहे हैं। शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम बढ़ाने की जरूरत है। अभिभावकों को भी बच्चों की दिनचर्या, मित्र मंडली और व्यवहार में बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। सामाजिक संगठनों ने नशा मुक्ति अभियान चलाने और युवाओं को खेल एवं सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि नशाखोरी पर नियंत्रण के लिए प्रशासन, समाज और परिवार तीनों को मिलकर काम करना होगा। नियमित जागरूकता अभियान, कड़ी निगरानी और नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाना समय की जरूरत है।

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