आमतौर पर व्यवस्था के सामने गैरकानूनी मामले इतने अधिक होते हैं कि समय के साथ-साथ वह मामले शांत हो जाते हैं और फिर से वही मामले चुप-चाप अपना काम करना शुरू कर देते हैं। यह वाकई सत्य है, इसी के चलते अवैध रूप से गर्भपात के कई मामले सामने आ रहे हैं। इससे पहले इस तरह के मामले सामने आने पर प्रशासन ने कई अस्पतालों और नर्सिन्ग होम पर छापे मारे थे लेकिन, छापों की यह कार्यवाई कुछ समय तक चली और कुछ औपचारिक्ताओं के बाद शांत होने लगी, और शांत भी हो गई। परन्तु वर्तमान में फिर से यह खेल शुरू हो गया है। आपको बताते चलें कि आजादी के बाद भी दो-ढाई दशकों

तक गर्भपात (।इवतजपवद) कराना गैरकानूनी था। यह तभी किया जा सकता था जब मां की जान बचाने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता ही न हो। किसी महिला के गर्भपात कराने की कोशिश पर आईपीसी की धारा 312 के तहत उसे तीन साल तक की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान रहा। इसके बाद भी गैरकानूनी तरीके से असुरक्षित गर्भपात धड़ल्ले से हो रहे हैं। नीम-हकीम, दाई, झोलाछाप और अप्रशिक्षित डॉक्टर गर्भपात को अंजाम दे रहे हैं। इस कारण महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी हो रहा है और कई बार महिला की जान भी चली जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने 1964 में शांतिलाल शाह कमिटी का गठन किया। कमिटी ने 1966 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने 1969 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी बिल राज्यसभा में पेश किया। बिल सिलेक्ट कमिटी में रिव्यू के लिए भेजा गया और आखिरकार 1971 में इस पर संसद के दोनों सदनों की मुहर लगी। 1972 में इसे लागू किया गया। इसके तहत कतिपय परिस्थितियों में 20 हफ्ते तक के गर्भ के गर्भपात को कानूनी बनाया गया। आज भारत में अबॉर्शन को लेकर बहुत ही प्रोग्रेसिव कानून है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (डज्च्) ऐक्ट 1971 का मुख्य उद्देश्य अबॉर्शन को कानूनी बनाना, सुरक्षित गर्भपात तक पहुंच कर उसे सुनिश्चित करना और अप्रशिक्षित लोगों को इसे अंजाम देने से रोकने के साथ-साथ महिला के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करना होता है। एमटीपी ऐक्ट, 1971 के सेक्शन 3 के सब सेक्शन (2) के मुताबिक इन स्थितियों में गर्भपात को इजाजत दी गई है।

















Leave a Reply